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Rafale Deal: जानिए क्या है राफेल डील और क्यूँ है ये विवादित

Rafale deal in hindiइन दिनों राफेल डील (Rafale deal) का विवाद दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. कांग्रेस सरकार के अध्यक्ष राहुल गाँधी आए दिन इस डील को लेकर अपनी बयानबाजी करते हुए नजर आ रहे हैं. वहीँ आए दिन न्यूज़ चैनल पर भी इस डील को लेकर बहस के लिए नेतायों को बुलाया जा रहा है. वैसे देखा जाए तो विपक्ष सरकार मोदी सरकार को गिराने के लिए अपनी नाकामयाब कोशिशें कर रही हैं ताकि वह आने वाले लोकसभा चुनाव 2019 में सत्ता हासिल कर पाए. ऐसे में राफेल डील को मुख्य विषय बना कर आए दिन विपक्ष दल मोदी सरकार पर ऊँगली उठा रहा है. चलिए जानते हैं आखिर यह rafale deal और क्यूँ दोनों सरकारें इस पर गह्मो-गहमी दिखा रही हैं.

क्या है राफेल डील (Rafale deal in Hindi)?

आपको बता दें rafale deal हकीक़त में एक जेट फाइटर डील है. यह डील साल 2016 को सितंबर में फ्रांस एवं भारतीय सरकार के बीच हुई थी. इस डील के तहत फ्रांस द्वारा भारत को 36 अत्याधुनिक लडाकू विमान दिए जाने थे. ख़बरों की माने तो इस डील को सरकार ने फ्रांस के साथ लगभग 7.8 करोड यूरों यानी 58 हज़ार करोड रुपए में किया था और इन विमानों को 2019 में भारत भेजा जाना तय हुआ था. लेकिन rafale deal को लेकर आए दिन कांग्रेस सरकार आरोप लगा रही है और मोदी सरकार पर कीमतों को लेकर निशाना साध रही है.

कांग्रेस सरकार का राफेल डील पर बयान

दरअसल Rafale deal को लेकर कांग्रेस का यह दावा है कि यूपीए सरकार के सत्ता के होने के समय ही इस डील को किया गया था. कांग्रेस के अनुसार उस समय एक फाइटर विमान की डील लगभग 600 करोड रुपए में तय की गई थी लेकिन अब मोदी सरकार में सत्ता के आने के दौरान अब एक फिघेत जेट लगभग 1600 करोड़ रुपए में बताया जा रहा है. इन्ही कीमतों का फर्क इस डील को आए दिन विवादित कर रहा है.

कईं सालों तक लटका रहा

दरअसल भारतीय वायु सेना काफी लंबे समय से विमान खरीदना चाहती थी ऐसे में प्रशिक्षण और मूल्यांकन के लिए 2011 में ही राफेल डील के लिए घोषणा कर दी गई थी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साल 2012 में ही राफेल डील को एल-1 बिडर घोषित कर दिया गया था और मैन्यूफैक्चर दसॉल्ट एविएशन के साथ कॉन्ट्रैक्ट की बातचीत शुरू कर दी गई थी. परंतु  आरएफपी  अनुपालन और लागत संबंधी कुछ मसलों के चलते इस डील को 2014 तक टाल दिया गया था.

Rafale Deal की ख़ासियत

दरअसल भारतीय वायु सेना को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए लगभग 42 फाइटर स्क्वाण्डर्स की जरूरत थी लेकिन बाद में इनकी वास्तविक क्षमता घट कर 34 रह गई. आपको बता दें कि वायु सेना की इस मांग के बाद 126 लड़ाकू विमान खरीदने का सबसे पहला प्रस्ताव एनडीए सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी ने रखा था जिसको आगे चलकर कांग्रे सरकार ने बढ़ाया. वायु सेना की 100 शब्बी एयरक्राफ्ट की मांग को अगस्त 2007 में मंजूरी दी गई थी जिसके बाद बोली लगने की प्रक्रिया को शुरू किया गया. इस राफेल विमान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह विमान लगभग 3800 किलोमीटर तक की उड़ान तेज़ी से भर सकता है.

ऐसे हुआ rafale deal के फाइटर विमान का चुनाव

आपको बता दें कि rafale deal मीडियम मल्टीरोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एमएमआरसीए कार्यक्रम का एक हिस्सा है जिसे रक्षा मंत्रालय की ओर से इंडियन एयर फोर्स और सुखोई के बीच मौजूद अंतर को खत्म करने के मकसद से शुरू किया गया था. मीडिया खबरों के अकनुसार एमएमआरसीए के कॉम्पिटीशन में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्‍ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्‍कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे.

इन विमानों में से राफेल जेट को इसलिए चुना गया क्यूंकि इसकी कीमतें बाकी विमानों के मुकाबले काफी कम थी और साथ ही यह विमान बाकी लडाकू विमानों से अधिक शक्तिशाली थे.

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