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वास्तु शास्त्र टिप्स- वास्तु शास्त्र का उपयोग करके सकारात्मक ऊर्जा चक्र तैयार करना

वास्तु शास्त्र के विज्ञान को लागू करके अपने घर में सकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करें

Vastu tipsवास्तु शास्त्र (vastu sastra) को “वास्तुकला का विज्ञान” भी कहा जाता है. यह हकीक़त में प्राकृतिक तत्वों की अदृश्य और अनंत शक्तियों जैसे कि हवा, पानी, आकाश, आग और पृथ्वी के साथ पर्यावरण-अनुकूल संबंध विकसित करने का विज्ञान है. हाल ही में किए गए एक अध्ययन से यह बात साबित हो चुकी है कि घर या कार्यालय के निर्माण में हमे कईं तरह के प्राकृतिक सिद्धांतों और नियमों की पालना करनी अनिवार्य है ताकि हमारे घर और कार्यलय के आस पास सकारात्मक उर्जा बनी रहे. हिंदू धर्म में वास्तु शास्त्र को बेहद अहम माना गया है. ऐसी मान्यता है कि दुनिया में मौजूद हर चीज़ वास्तु से जुडी हुई है. ऐसे में यदि कोई भी वस्तु अपने सही स्थान से उल्ट दिशा में रखी हो तो उसका हमारी जिंदगी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

वहीँ यदि अपने घर में वास्तु के हिसाब से संतुलन रखा जाए तो घर में खुशियाँ बनी रहती हैं और चिंताएं, बीमारियाँ, दुःख घर से कौसों दूर रहते हैं. इतना ही नहीं बल्कि सही वास्तु से घर में धन का आगमन होता है. इसी प्रकार, कार्यालय और संगत कार्यस्थल के लिए वास्तु सफलता, समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करता है. गृह निर्माण के लिए वास्तु शास्त्र की अवधारणा बिल्डरों द्वारा भी पहचानी जा रही है. इसलिए कोई भी बिल्डर घर का निर्माण करने से पहले एक बार वास्तु शास्त्र का ध्यान जरुर रखता है. किसी भी घर की संरचना केवल ईंटों, सीमेंट, पत्थरों से ही नहीं की जा सकती बल्कि इसके लिए घर में रहने वाले लोगों के आपसी रिश्ते भी अहमियत रखते हैं. बेशक मनुष्य की जिंदगी का फैसला उस्सका भाग्य या किस्मत द्वारा किया जाता है लेकिन यदि हम वास्तु शास्त्र इ नियमों को अपनी जिंदगी में ढाल लें तो एक नई क्रांति लाई जा सकती है.

वास्तु शास्त्र एकमात्र ऐसा विषय है, जो हर वास्तु के मायने बदल देता है. इसलिए साधारण जिंदगी में वास्तु को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना काफी कठिन प्रक्रिया है. इसके इलावा कईं बार वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का निर्माण करना इंजीनियरों के लिए भी कठिन हो जाता है.

घर के लिए वास्तु शास्त्र टिप्स

इसे ध्यान में रखते हुए, यहां मैं वास्तु शास्त्र के केवल वैज्ञानिक रूप से प्रासंगिक और व्यावहारिक रूप से व्यवहार्य तथ्यों के बारे में बताने जा रही हूं जिन्हें हम सभी अपने जीवन में आसानी से लागू कर सकते हैं:

हवा, पानी, आकाश, अग्नि और पृथ्वी यह ऐसे पांच तत्व हैं, जो प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं साथ ही यह सभी तत्व कार्बनिक और अकार्बनिक वस्तुओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं. किसी भी व्यक्ति को पृथ्वी (उत्तर-दक्षिण ध्रुव) की विद्युत चुम्बकीय शक्तियों पर विचार करना चाहिए, पृथ्वी और पृथ्वी के ग्रहों में होने वाला  गुरुत्वाकर्षण बल, एकमात्र उपग्रह चाँद के कारण प्रभावी होता है.  इन्हें संतुलित करके और अनंत सत्य का अनुभव करने के लिए प्रकृति के साथ एक सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित किया जा सकता है. आइए प्रकृति के विभिन्न तत्वों को और गहराई सेजानते हैं, ताकि यह समझ सके कि इनमे संतुलन की आवश्यकता आखिर क्यों है?

सूर्य का वास्तु शास्त्र में होना 

सूर्य उर्जा/अग्नि का एकमात्र स्रोत है. अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर सूर्य की विद्युत चुम्बकीय तरंगे क्या हैं और वास्तु शास्त्र इन्हें कैसे प्रभावित कर सकता है, तो चलिए जानते हैं इन सवालों के जवाब विस्तार से.

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अग्नि प्रकाश पैदा करती है और भोजन के पकने में अपना योगदान देती है. वहीँ दूसरी ओर सूर्य की किरणें सात रंगों से बनी होती हैं जिनमे लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, नीलिगो और बैंगनी (VIBGYOR) रंग शामिल है. इसके इलावा सूर्य के लाल रंग में इन्फ्रा रेड किरणें और बैंगनी रंग में बड़े अनुपात में अल्ट्रा-बैंगनी किरणें शामिल होती हैं. लेकिन हम में से ज्यादातर यह बात नहीं जानते कि वास्तु शास्त्र सूर्य और इन किरणों के अदृश्य प्रभावों पर ही आधारित है. दरअसल, विद्युत चुम्बकीय आवृत्तियों में सकारात्मक और हानिकारक प्रभाव होते हैं. इन्ही के आधार पर सूर्य का वास्तु शास्त्र बनाया गया है जिसे विद्युत-चुंबकीय अनुकूल वातावरण भी कहते हैं.

सूर्य हमेशा पूर्व दिशा से निकलता है और पश्चिम दिशा में छिपता है. परंतु हर साल सूर्यदय की दिशा कुछ डिग्री में बदल जाती है. ऐसे में घर का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखें कि आपके घर की ज़मीन पर सूर्य की किरनें सीधी पड़नी चाहिए. इसके इलावा घर के उत्तर-पूर्व दिशा में कोई भी भारी भरकम या लंबा वृक्ष नहीं लगा होना चाहिए. दरअसल, उत्तर-पूर्व दुसह में सूर्य की किरणे सबसे अधिक निकास करती हैं शायद इसी कारण ज्यादातर डॉ. हमे सुबह के प्रकाश में अधिक से अधिक पानी पीने की सलाह देते हैं.वहीँ बात रात के समय की करें तो रात में पृथ्वी पर चंद्रमा का प्रभाव सबसे अधिक होता है ऐसे में पूर्णिमा और अमावस्या के दौरान कईं तरह की मनोवैज्ञानिक शक्तियां जन्म लेती हैं. हालाँकिसभी मनुष्यों में जैव रासायनिक प्रतिक्रिया एक समान होती है लेकिन कुछ लोग चंद्रमा के प्रभाव से सबसे अधिक संवदेनशील होते हैं.

धरती की वास्तु शास्त्र में भूमिका

पृथ्वी सौर मंडल का एक महत्वपूर्ण ग्रह है और हम सभी जानते हैं कि यह अन्य ग्रहों और उपग्रहों के साथ सूर्य के चारों ओर घूमता है. धरती पर चुंबक हमेशा नार्थ-साउथ दिशा में ही स्थिर रहता है. ठीक इसी प्रकार मानव शरीर में भी चुंबकीय प्रभाव होता है. मनुष्य के सिर को उत्तर दिशा में माना जाता है जबकि उसके पैरों को दक्षिण ध्रुवी दिशा समझा जाता है. मनुष्य का यही नियम  कंपास के वास्तु शास्त्र को प्रेरित करता है. यदि हम अपने पैरों के साथ दक्षिण की तरफ सोते हैं, तो सिर पृथ्वी के चुंबकीय उत्तर-ध्रुव की दिशा में आता है जिससे प्रतिकृति होती है. जब मनुष्य स्सोता है तो उसकी नींद की कोई ध्वनी अर्थात आवाज़ नहीं होती क्योंकि प्रतिकृति रक्त परिसंचरण और मानसिक संतुलन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है. ऐसे में वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार हमे हमेशा अपने पैर उत्तरी दिशा की तरफ रख कर ही सोना चाहिए. ऐसा करने से हमारी नींद विकार की समस्याएं हल हो जाती है. इसके इलावा इस स्तिथि में सोने से हमारा मस्तिष्क भी शांत रहता है और तनाव से दूर रहता है.

पानी की वास्तु शास्त्र में भूमिका 

पृथ्वी पर पानी एक महत्वपूर्ण तत्व है. मनुष्यों, जानवरों, और पेड़ पौधों में लगभग 2/3 फ़ीसदी पानी होता है. पानी की कमी की स्तिथि में कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता. सूरज की गर्मी के कारण, पानी वाष्पित हो जाता है और बादल बनते हैं, जो बरसने के बाद (बारिश) में फिर से वाष्पित हो कर बादल बन जाते हैं. यह बादल एक बार फिर से बारिश में बदल जाते है. इस चक्र को जल चक्र कहा जाता है, यह चक्कर कभी नहीं रुकता और ऐसे ही चलता रहता है. पानी शुद्ध करने वाला ऐसा तत्व है जो  हवा में धूल के कणों और अशुद्धियों को अपनी ओर आकर्षित करता है. यही  पानी हमारे जीवन में एक नउर्जा का स्रोत बनता है.

हवा का वास्तु शास्त्र 

पृथ्वी पर वायुमंडल के कारण, हवा में  ऑक्सीजन (21%) मौजूद होता है जोकि मनष्य के लिए बेहद आवश्यक है. पृथ्वी के वायुमंडल में, सबसे बड़ा घटक नाइट्रोजन (78%) है जो सभी पौधों के विकास के लिए भी आवश्यक है. पौधे हमेशा कार्बन डाइऑक्साइड को अवशेषित करते हैं और ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं. जबकि हम मनुष्य इस मामले में उनसे विपरीत है. दरअसल, मनुष्यों को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है जोकि उन्हें पौधों से मिलती है. बदले में मनुष्य पौधों को कार्बन डाइऑक्साइड देते हैं. मनुष्य और पौधों के बीच यह चक्र हमेशा चलता ही रहता है. इसलिए वास्तु शास्त्र के अनुसार भी मनुष्य के लिए कार्बन डाइऑक्साइड हानिकारक तत्व है. ऐसे में रात में पेड़ के नीचे सोना वास्तु शास्त्र के नियमों के विरुद्ध है. वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति को रात में  श्मशान घाट, सीवेज उपचार संयंत्र, कारखानों के कारण प्रदूषण, और खुले गोंडा नल्लाह,  आदि जैसी जगहों के पास  नहीं सोना चाहिए.

वास्तु शास्त्र की आकाश में भूमिका 

आकाश दिव्य, उदार ब्रह्मांड है और जोकि  निर्वात, अनंत, असीमित और असंगत है. यह कईं आकाशगंगाओं  से मिल कर बना है. दरअसल, गैलेक्सी की मिल्की वे को आकाश गंगा के नाम से जाना जाता है. हमारा सौर मंडल सभी मनुष्यों को प्रभावित करता है. इस सौर मंडल में कुल 9 ग्रह हैं. हालाँकि सभी ग्रहों पर ऊर्जा, प्रकाश, लौकिक किरनें, विद्युत चुम्बकीय बल, और गुरुत्वाकर्षण बल की तीव्रता विभिन्न होती हैं. इन सभी ग्रहों की लौकिक किरणों का सीधा असर पृथ्वी के जीवन पर पड़ता है. लेकिन पृथ्वी की उन ग्रहों से दूरी के कारण यह प्रभाव मेहसूस नही किया जा सकता.

अगर हमारा घर या काम की जगह मानसिक शांति प्रदान नहीं करती है, तो उस जगह को वास्तु शास्त्र बेकार समझता है.  इसलिए वास्तु शास्त्र का विज्ञान, वांछित उद्देश्य के लिए पूर्ण सद्भाव में प्रकृति के तत्वों को संतुलित करता है.  यदि हम महान और दिग्गज पुरुषों की जिंदगी पर रिसर्च करें तो  उनके जाने अनजाने में किए गए वास्तु शास्त्र नियमों का पालन ही उनकी कामयाबी का असली कारण निकलेगा. यहां मैंने वस्तू शास्त्र का बस एक विवरण दिया है जो मैं आगे चल कर पने  भविष्य के पदों में शामिल करने वाली हूँ..!!

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