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भारत में महिलाओं के अधिकार

भारत में महिला अधिकार - वेक अप कॉल

Women’s Rights in India (English)

भारत में औरतों के साथ लगातार हो रही प्रताड़ना का एकमात्र कारण यह है कि लोग महिलायों के अधिकारों से वाकिफ नहीं हैं इसलिए आए दिन हिंसा के मामले अंजाम दे रहे हैं. ‘Women Rights in India’ के बारे में अज्ञानता महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बढ़ते मामलो में योगदान देने वाले प्रमुख कारको में से एक है. औरतों के अधिकारों के बारे में जानना जितना औरतों के लिए जरूरी है, उससे कहीं गुना अधिक मर्दों के लिए भी है. महिलाओं के अधिकार उनके लिए सतर्कता की मांग करते हैं.

वुमेन राइट्स यानि महिलाओं के अधिकार किसी भी समाज में रहने वाली औरतों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एक रोल मॉडल के लिए घृणास्पद है. यदि औरतों के खिलाफ अपराध दर में कोई कमी नहीं आती तो इन अधिकारों को लगभग हर विश्व मानचित्र पर रखा जाना चाहिए. शहरीकरण में बढ़ोतरी से महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा से संबंधित घटनाओं में तेजी आई है जिससे भारत में सामाजिक और स्वास्थ्य समस्याओं में नया आयाम आ रहा है. प्रतिस्पर्धा में रहने के लिए, आज की दुनिया में प्रमुख ध्यान लिंग समानता से संबंधित सबसे बड़ी बाधाओं से लड़ना है. औरतों के अधिकार उन्हें कानून के समान संरक्ष्ण और जीवन में स्वतंत्रता दिलवाते हैं.

क्या है महिला के अधिकार?

हालाँकि संवैधानिक और कानूनी रूप से लैंगिक समानता की रक्षा की गई है. लेकिन इसके बावजूद भी भारतीय संदर्भ में महिलाओं का यौन, मानसिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से शोषण किया जा रहा है. प्रत्येक महिला के हिस्से में, उसकी भूमि के कानून के बारे में जागरूकता जरूरी है. ऐसे में इस लेख का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों पर अंतर्दृष्टि प्रदान करना है.

भारत में महिलाओं के अधिकारों पर  संक्षिप्त जानकारी

भारत में महिलाओं के मौलिक अधिकारों को संविधान के विभिन्न प्रावधानों और संसद और राज्य विधायिकाओं के कानून-कार्य द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है.

भारत के संविधान में तैयार महिलाओं के अधिकार

संविधान ने सुनिश्चित किया है कि धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं है. भारत में महिलाओं के अधिकारों को संविधान में संरक्षित किया जाता है जो सुनिश्चित करता है कि महिलाओं को मर्दों की तरह ही गरिमा और सम्मान के साथ जिंदगी व्यतीत करने का पूरा हक है. संवैधानिक प्रावधानों के तहत, भारत में महिलाओं के लिए मौलिक अधिकारों को रोजगार, मानव तस्करी और कार्यस्थल पर मानवीय स्थितियों, मातृत्व राहत, पंचायत और नगर पालिका चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण के क्षेत्रों में संरक्षित किया गया है.

संविधान में विधायी प्रावधानों के संदर्भ में, प्रसूति, दहेज, अनैतिक यातायात, सती कमीशन से संबंधित अधिनियम तैयार किए गए हैं। सरकार ने महिलाओं के लिए एनसीडब्ल्यू-राष्ट्रीय आयोग की स्थापना, गर्ल चाइल्ड पर ध्यान केंद्रित करने और स्थानीय निकायों के चुनावों में आरक्षण के जरिए महिलाओं के लिए विशेष पहल की है.

अपराध श्रेणियां 

कानूनी तौर पर किए जा रहे अपराधों को भारतीय दंड संहिता और विशेष कानूनों के तहत वर्गीकृत किया गया है. आईपीसी अपराधों जैसे कि बलात्कार / अपहरण / दहेज मृत्यु / मानसिक और शारीरिक यातना आदि को  उत्पीड़न / यौन उत्पीड़न की दंडित श्रेणी में रखा गया है. महिलाओं की उभरती मांगो को पूरा करने के लिए और समाज में उन्हें मर्दों के बराबर अधिकार देने के लिए कुछ विशेष सामाजिक अधिनियम बनाए गए हैं जोकि मुख्य रूप से रोज़गार, श्रम, दहेज़, मातृत्व और बाल विवाह से संबंधित हैं.

आज के समय में देखा जाए तो हम महिलाओं के खिलाफ अपराधों में व्यापक वृद्धि का सामना कर रहे हैं. भले ही वयस्क हो या नाबालिग , यह महत्वपूर्ण हो गया है कि उत्पीड़न जैसे किसी भी मामले की सूचना महिला केंद्र या पुलिस स्टेशनदी जाए ताकि पीड़ित को जल्द से जल्द उचित न्याय दिया जा सके. आज की दुनिया में, यह समझना बेहद ज़रूरी हो गया है कि हम कानूनी रूप से किस हकदार हैं.

मैं इस ब्लॉग की एक श्रृंखला को आगे लाने का प्रयास कर रही हूं जो भारत में  औरतों के लिए जागरूकता पैदा करेगा. अगले ब्लॉग में मै भारत में “गंभीर कानूनी महिलाओं के अधिकार” के बारे में बात करूंगी.

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